Maharshi Mehi Paramhans Ji: जानिए उनका संपूर्ण जीवन चरित्र

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जब भी हम मानसिक शांति या अध्यात्म की बात करते हैं, तो हमारे मन में किसी कठिन साधना या हिमालय की गुफाओं का ख्याल आता है। लेकिन 20वीं सदी में भारत की पावन धरती पर एक ऐसे महान संत हुए, जिन्होंने ईश्वर को पाने और ध्यान लगाने की विधि को बेहद सरल बना दिया। हम बात कर रहे हैं संत सद्गुरु Maharshi Mehi परमहंस जी महाराज की, जिन्होंने अपना पूरा जीवन समाज को सही रास्ता दिखाने में समर्पित कर दिया।
Maharshi Mehi जी का जन्म और अलौकिक बचपन
संत Maharshi Mehi जी का जन्म 28 अप्रैल 1885 को बिहार के सहरसा (जो अब मधेपुरा जिला है) के खोखसी श्याम गाँव में उनके ननिहाल में हुआ था। उनके माता-पिता ने उनका नाम रामानुग्रह लाल दास रखा था। उनके जन्म से जुड़ी एक बेहद अनोखी बात यह है कि बचपन में उनके सिर पर सात जटाएँ थीं, जिन्हें देखकर लोग समझ गए थे कि यह बालक आगे चलकर कोई साधारण इंसान नहीं बल्कि एक बड़ा योगी बनेगा।
बाद में उनका नाम ‘मेँहीं’ रखा गया, जिसका अर्थ होता है ‘अत्यंत सूक्ष्म या तेज’। उनका पैतृक गाँव पूर्णिया जिले का सिकलीगढ़ धरहरा था।
पढ़ाई और तीव्र वैराग्य की शुरुआत
जब वे सिर्फ चार साल के थे, तब उनकी माता का साया उनके सिर से उठ गया। उनकी परवरिश उनकी बड़ी बहन और पिता ने की। Maharshi Mehi जी बचपन से ही पढ़ने में बहुत तेज थे। उन्होंने खुद से ही देवनागरी सीखी और आगे चलकर अंग्रेजी, उर्दू और फारसी भाषाओं का भी अच्छा ज्ञान हासिल किया।
उनकी जिंदगी में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब वे पूर्णिया जिला स्कूल में मैट्रिक की परीक्षा दे रहे थे। अंग्रेजी के पेपर में एक कविता आई, जिसका सार था कि ‘हर मनुष्य को एक दिन मरना है’। इस बात ने उनके दिल को इस कदर छुआ कि उन्होंने परीक्षा की कॉपी पर सवालों के जवाब लिखने के बजाय रामचरितमानस की यह प्रसिद्ध चौपाई लिख दी:
“देह धरे कर यहि फल भाई, भजिय राम सब काम बिहाई।”
इसके बाद, 3 जुलाई 1904 को वे हमेशा के लिए स्कूल और घर छोड़कर सच की खोज में निकल गए।
गुरु की खोज और कुप्पाघाट की कठिन तपस्या
घर छोड़ने के बाद वे कई सालों तक सच्चे गुरु की तलाश में भटकते रहे। आखिरकार सन् 1919 में उनकी मुलाकात उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद के परम संत बाबा देवी साहब से हुई। बाबा देवी साहब ने उनकी लगन को देखा और उन्हें संतमत की सबसे ऊंची दीक्षा यानी ‘दृष्टियोग’ और ‘नादानुसंधान’ (आंतरिक प्रकाश और ध्वनि की साधना) सिखाई।
अपने गुरु के आदेश पर Maharshi Mehi जी ने कई सालों तक बेहद कठिन तपस्या की। उन्होंने बिहार के भागलपुर में गंगा नदी के किनारे स्थित कुप्पाघाट की एक अंधेरी और शांत गुफा को अपनी साधना स्थली बनाया। महीनों तक उस गुफा में मौन रहकर उन्होंने ध्यान लगाया और आत्म-साक्षात्कार (Enlightenment) प्राप्त किया। आज यही कुप्पाघाट आश्रम पूरी दुनिया में ‘अखिल भारतीय संतमत सत्संग’ का मुख्य केंद्र है।
संतमत का मुख्य संदेश और समाज सुधार
Maharshi Mehi जी का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने वेदों, उपनिषदों और कबीर-नानक जैसे संतों के विचारों को एक समान बताया। उन्होंने ‘सत्संग योग’ नाम की एक महान पुस्तक लिखी। उनका मानना था कि मोक्ष पाने के लिए किसी को घर-बार छोड़ने की जरूरत नहीं है। उन्होंने हर आम इंसान के लिए तीन सीधे नियम बताए:
- हमेशा सच बोलना, नशा न करना और सदाचारी जीवन जीना।
- अच्छे विचारों वाले लोगों के साथ नियमित रूप से सत्संग करना।
- रोजाना कुछ समय निकालकर अंतर्मुखी होकर ध्यान साधना करना।
लगभग 101 वर्ष की लंबी और प्रेरणादायक आयु जीने के बाद, 8 जून 1986 को उन्होंने भागलपुर के कुप्पाघाट आश्रम में अपने भौतिक शरीर का त्याग किया। उनका चरित्र और उनके विचार आज भी करोड़ों लोगों को सही राह दिखा रहे हैं।
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Q1. महर्षि मेँहीं का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
Ans. महर्षि मेँहीं जी का जन्म 28 अप्रैल 1885 को बिहार के खोखसी श्याम गाँव (मधेपुरा) में हुआ था और उनका पैतृक गाँव सिकलीगढ़ धरहरा (पूर्णिया) था।
Q2. महर्षि मेँहीं जी के गुरु का क्या नाम था?
Ans. उनके मुख्य दीक्षा गुरु उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद के प्रसिद्ध संत बाबा देवी साहब थे।
Q3. संतमत का मुख्य मुख्यालय कहाँ स्थित है?
Ans. अखिल भारतीय संतमत सत्संग का मुख्य मुख्यालय बिहार के भागलपुर जिले में गंगा नदी के तट पर स्थित कुप्पाघाट आश्रम है।

